मध्य प्रदेश राज्य की भू-वैज्ञानिक संरचना | mp ki bhu vaigyanik sanrachna

मध्य प्रदेश भूवैज्ञानिक संरचना प्रायद्वीपीय पठार का उत्तरी हिस्सा है यह पठार भूवैज्ञानिक इतिहास में कभी भी पूर्ण रूप से जलमग्न नहीं हुआ है केवल कुछ समय के लिए इस प्रकार का कुछ हिस्सा छिछले ले समुद्रों से ढका हुआ था।

☪︎ मध्यप्रदेश राज्य की भौगोलिक संरचना

mp ki bhu vaigyanik sanrachna:– इस वजह से इस पठार पर कई कालों की भूवैज्ञानिक संरचना का विकास हुआ मध्य प्रदेश का अधिकांश भाग प्रायद्वीपीय पठार का हिस्सा होने के कारण विभिन्न कालों की भूवैज्ञानिक संरचना देखने को मिलती है ।

मध्य प्रदेश राज्य की भू-वैज्ञानिक संरचना | mp ki bhu vaigyanik sanrachna

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राज्य की भूवैज्ञानिक संरचना को निम्नलिखित कालों में विभाजित किया गया है-

आद्य महाकल्प (आर्कियन) क्रम की चट्टाने –

यह सर्वाधिक प्राचीन और प्राथमिक आग्नेय चट्टान हैं क्योंकि इनका निर्माण तप्त एवं पिघली हुई पृथ्वी के होने के दौरान हुआ था वर्तमान में अत्यधिक रूपांतरण के कारण इन चट्टानों का मूल रूप नष्ट हो चुके हैं आर्कियन काल की चट्टाने पृथ्वी की पहली कठोर चट्टाने मानी जाती है इन प्रारंभिक चट्टानों में जीवाश्म के अवशेष नहीं पाए जाते हैं क्योंकि तत्कालीन समय में पृथ्वी पर जीवन का विकास नहीं हुआ था मध्य प्रदेश में इस काल की चट्टाने बुंदेलखंड नीस के रूप में बुंदेलखंड क्षेत्र में मिलती हैं और मध्य प्रदेश में इनका विस्तार सबसे ज्यादा है।

धारवाड़ क्रम की चट्टाने –

धारवाड़ चट्टानों का निर्माण आर्कियन क्रम की चट्टानों के अपरदन एवं निक्षेपण से हुआ है जिस कारण इन्हें अवसादी चट्टानें कहते हैं यह अवसादी चट्टानें सर्वाधिक प्राचीन चट्टाने हैं और इन चट्टानों में जीवाश्म नहीं पाए जाते हैं और इनकी प्रमुख दो वजह मानी गई है या तो उस समय तक जीवो की उत्पत्ति नहीं हुई थी या फिर लंबा समय बीत जाने के कारण इन चट्टानों के जीवाश्म समाप्त हो चुके हैं।

ठीक इसी प्रकार की चट्टाने कर्नाटक राज्य के धारवाड़ व शिमोगा जिले में पाई जाती है जिस कारण इन्हें धारवाड़ नाम दे दिया गया है धारवाड़ समूह की चट्टाने मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के जबलपुर बालाघाट और छिंदवाड़ा जिले में मिलती है जबलपुर में चट्टाने चूने के पत्थर के रूप में और छिंदवाड़ा में सौंसर एवं सिकोली सीरीज के रूप में और बालाघाट में चिल्पी सीरीज के रूप में यह चट्टानें पाई जाती है।

सौसर एवं सिकोली सीरीज में मैग्नीज तथा चिल्पी सीरीज में स्लेट एवं फाइलाइट की मोटी सतह मिलती है प्राचीन कठोर चट्टानों के अपरदन से बनने के कारण इन चट्टानों में भी जीवाश्म नहीं पाए जाते हैं।

पुरान संघ –

समय के आधार पर पुरान संघ की चट्टानों को दो भागों में विभक्त किया गया है जो निम्नलिखित हैं

(1) कडप्पा समूह
(2) विंध्यान समूह

कडप्पा समूह

इन चट्टानों को आदिवासी चट्टानें कहा जाता है क्योंकि इनका निर्माण धारवाड़ क्रम की चट्टानों के अपरदन व निक्षेपण से हुआ है आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले में इस प्रकार की चट्टाने अर्धवृत्त आकार क्षेत्र में विस्तृत पाई जाती हैं इसलिए इनका नाम कडप्पा रखा गया है मध्यप्रदेश में कडप्पा समूह की चट्टाने बिजावर पन्ना एवं ग्वालियर में सेल जास्पर पोर्सलेनाइट एवं हारंस्टोन के रूप में पाई जाती है कडप्पा समूह की चट्टाने अत्यधिक टूटी एवं कायांतरित रूप में देखने को मिलती है प्रदेश में बिजावर की कडप्पा सेल में हीरा मिलता है।

विंध्यान समूह

यह अवसादी चट्टानें हैं इनका निर्माण कडप्पा चट्टानों के बाद अवसादी के निक्षेपण में हुआ और इन चट्टानों में जीवाश्म होने के प्रमाण भी मिले मध्य प्रदेश की पन्ना की खाने और कर्नाटक की गोलकुंडा की खाने है जहां से हीरा प्राप्त होता है विंध्यान क्रम की चट्टाने में ही स्थित है।

मध्यप्रदेश में इन चट्टानों का विस्तार नदी के उत्तर-पश्चिम में रीवा से लेकर चंबल नदी के पश्चिम में राजस्थान तक है मध्यप्रदेश में विंध्यन समूह की चट्टाने जलज प्रकार की हैं इन पर अंतर भौमिक क्रियाओं का प्रभाव नहीं पड़ा है विंध्य शैल समूह की चट्टानों को लोअर विंध्यन और अपर विंध्यन में विभाजित किया जाता है लोहार विंध्यन शैल समूह सोन घाटी में चूने पत्थर सेल तथा बालू पत्थर के रूप में फैली है अपार विंध्यन समूह की चट्टाने नर्मदा के उत्तर में कैमूर रीवा तथा भांडेर सीरीज के रूप में फैली है विंध्यन समूह की चट्टानों में अल्प मात्रा में छोटे जंतुओं एवं वनस्पति के अंश मिलते हैं।

आर्य समूह-

आरक्षण की चट्टाने जलन प्रकार की है क्योंकि इनकी उत्पत्ति जली क्षेत्रों में अवसाद के निक्षेपण के कारण हुआ आर्य समूह की चट्टाने मध्यप्रदेश में गोंडवाना शैल समूह के रूप में पाई जाती हैं।

गोंडवाना क्रम की चट्टाने-

इन चट्टानों का निर्माण कार्बनी फेरस से जुरासिक काल के मध्य हुआ था भारत का अधिकांश कोयला गोंडवाना क्रम की चट्टानों में ही पाया जाता है मध्यप्रदेश में गोंडवाना शैल समूह की चट्टाने सतपुड़ा एवं बघेल्खंड पठार पर मिलती है प्रदेश में इस समूह की चट्टानों का अध्ययन तीन भागों लोअर गोंडवाना मध्य गोंडवाना और अपर गोंडवाना में विभाजित करके किया जाता है लोअर गोंडवाना समूह की चट्टाने एवं महा नदी घाटी में ताल चीर के रूप में फैली हैं मध्य प्रदेश की पेंचघाटी एवं मोह पानी के कोयला क्षेत्र इसी समूह के चट्टानों में स्थित है।

मध्य प्रदेश में मध्य गोंडवाना समूह की चट्टाने सतपुड़ा के चार स्तर में मिलती हैं _

1) पंचेत
2) पचमढ़ी
3) देनवा एवं
4) बागरा

मध्य गोंडवाना समूह की चट्टानों में बालू का पत्थर मिलता है और अपर गोंडवाना समूह की चट्टानों में बालू एवं चूने के पत्थर सेल कोयला एवं वनस्पति पदार्थ मिलते हैं।

क्रीटेशस कल्प –

मध्यप्रदेश में क्रीटेशस कल्प की चट्टानें बाघ सीरीज एवं लमेटा सीरीज के रूप में पाई जाती हैं क्रीटेशस कल्प की चट्टानों में सिलिका मिश्रित चूने के पत्थर बालू पत्थर ग्रिट एवं क्ले तथा जीवाश्म के अवशेष पाए जाते हैं।

तृतीयक शैल समूह-

यह चट्टाने दक्षिण मध्य प्रदेश में पाए जाते हैं मध्यप्रदेश में तृतीयक काल में नर्मदा सोन घाटी का निर्माण हुआ एवं उत्तरी मध्य प्रदेश के प्रभाती ढलान भी इसी काल में विकसित हुए प्रदेश में पठारी भागों में नदी घाटियों का निर्माण तृतीय काल में ही हुआ।

दक्कन ट्रेप-

क्रीटेशस काल में प्रायद्वीपीय भारत में हुई दरारी ज्वालामुखी प्रक्रिया से मिढीनुमा दक्कन ट्रैप का निर्माण हुआ इसमें बेसाल्ट की चट्टानें पाई जाती है जो कि बहुत ही कठोर होती है दीर्घकाल में इनके निक्षेपण से काली या रेगुर मिट्टी का निर्माण होता है।

बेसाल्ट-

बेसाल्ट एक प्रकार की ज्वालामुखी आग्नेय चट्टान है इसका निर्माण बेसाल्ट लावा के धरातल पर आकार तेजी से जमने की वजह से होता है और इसी कारण यह कण विहीन गैर रवेदार रूप में पाई जाती है चट्टान काले भूरे रंग की होती है यह चट्टान सूक्ष्म कणों से बनी होती है इस प्रकार की चट्टान मेंटल के पिघलने की वजह से बनती है इसका प्रयोग मूर्तियां बनाने में किया जाता है।

नीस-

नीस कायांतरित सेल का एक प्रकार है (आग्नेय एवं अवसादी शैल में ताप एवं दाब के कारण परिवर्तन या रूपांतरण हो जाने से कायांतरित शैल का निर्माण होता है) इसका निर्माण ग्रेनाइट से होता है।

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